थोड़ी  पुराणी बात है

शहर में घुमते हुए कई इमारतें देखी
कुछ नयी कुछ पुराणी, कुछ ऊँची कुछ नीची
कईयों के बड़े बड़े मैदान भी
और कहीं किसी एक में घड़ी भी लगी हुई थी

उस दिन मन में आया… इनमे एक इमारत हो मेरी भी…

लेकिन क्यों? कईं चाहिए एक इमारत?
क्या वजूद है इन् इमारतों का?
बसेरा हैं किसी का या सिर्फ शहर की चकाचौंध?
कैसे बनती है ये इमारतें? नीव? कितनी ज़मीन? कितना मंज़िला?

आज भी सोचता हूँ तो जवाब मुकर जाते हैं

पता नहीं शौक था या फ़ितूर…
या भरोसा… कि मैं भी इमारत बना सकता हूँ

कुछ अपनी ही तरह के सरफेरे साथी भी मिल गए
जिन्हे मेरी ही तरह इमारतों का शौक था

काफी होगा न इतना सब, एक ईमारत बनाने के लिए ?

ek imaarat meri bhi – part 1 – shuruat

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